जिस प्रकार साहित्य, धर्म और विज्ञान का लोक के व्यापक जीवन में प्रवेश आवश्यक है, उसी प्रकार जीवन के संस्कार और समाज की स्थिति के लिये कला की अनिवार्य आवश्यकता है। यदि कला कुछ सौन्दर्य-प्रेमियों के लिये विलास या कुतूहल-वृत्ति का साधन मात्र रहेगी, तो लोक की बड़ी हानि होगी। वस्तुतः कला जीवन के सूक्ष्म और सुन्दर पट का वितान है, जिसके आश्रय में सम्पूर्ण लोक अपनी उत्सवात्माओं और संस्कारक प्रवृत्तियों को तृप्त करता हुआ उच्च मन की शान्ति और समन्वय का अनमोल वर पा सकता है। मनुष्य अपने अंतिम कल्याण के लिये यह चाहता है कि जितना स्थूल जड़ जगत उसके चारों ओर घिरा हुआ है, उसको सुन्दर रूप में ढाल ले। स्थूल के ऊपर जो मानव और अध्यात्म जगत है, उसको चरित्र और ज्ञान के द्वारा हृदय-आकर्षक और सौन्दर्ययुक्त बनाते हैं। इस द्विविध सौन्दर्य के बीच में ही जीवन पूरी तरह से रहने योग्य बनता है। जिस समय जीवन के चरित्र और मनोभाव हमारे चारों ओर विकसित होकर अपनी लहरियों से वातावरण को भर देते हैं और उनकी तरंगें हमारे अंतर्जगत को आह्लादित और प्रेरित करती हैं, उस समय यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि स्थूल पार्थिव वस्तुओं के जो आकार-रूप हमें घेरे हुए हैं, वे भी कला के प्रभाव से द्रवित हो जाएँ और उनमें से रूप-सौन्दर्य और श्री के स्रोत फूट निकलें। कला का प्रत्येक उदाहरण जगमगाते दीपक की तरह अपने चारों ओर प्रकाश की किरणें भेजता रहता है।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और (क) भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए, (ख) गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि जीवन किस स्थिति में रहने योग्य बनता है, तथा (ग) रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 2 — Question 2
जीवन को उसकी समग्रता में सोचना और जीवन को एक खास इरादे से सोचना दो अलग तरह की तैयारियाँ हैं और इस माने में साहित्य जब भी राजनीति की तरह भाषा का एकतरफा या इकहरा प्रयोग करता है, वह अपनी मूल शक्ति को सीमित या कुंठित करता है। राजनीति के मुहावरे में बोलते समय हम एक ऐसे वर्ग की भाषा बोल रहे होते हैं जिसके लिये भाषा प्रमुख चीज नहीं है; वह भाषा का दूसरे या तीसरे दर्जे का इस्तेमाल है। वह एक खास मकसद तक पहुँचने का साधनमात्र है। उसे भाषा की सामर्थ्य, प्रामाणिकता या सच्चाई में उस तरह दिलचस्पी नहीं रहती जिस तरह साहित्य को। उसकी भाषा प्रचार-प्रमुख, रेटोरिकल और नकली व्यक्तित्व की भाषा हो सकती है क्योंकि राजनीति के लिये भाषा एक व्यावहारिक और कामचलाऊ चीज है, जबकि साहित्यकार के लिये भाषा उस जिंदगी की सच्चाई का जीता-जागता हिस्सा है जिसे वह राजनीतिक, व्यावसायिक, व्यावहारिक या स्वार्थों की हिंसा, तोड़-फोड़ और प्रदूषण से बचाकर उसकी मूल गरिमा और शक्ति में स्थापित या पुनःस्थापित करना चाहता है। साहित्य का काम अपनी पहचान को राजनीति की भाषा में खो देना नहीं, बल्कि उस भाषा के छद्म से अपने को लगभग बेगाना करके अकेला कर लेना है—एक संत की तरह अकेला—कि राजनीति के लिये जरूरी हो जाए कि वह बार-बार अपनी प्रामाणिकता और सच्चाई के लिये साहित्य से भाषा माँगे, न कि साहित्य ही राजनीति की भाषा बनकर अपनी पहचान खो दे।
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर (क) उपयुक्त शीर्षक दीजिए, (ख) साहित्य और राजनीति की भाषा में प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए तथा (ग) गद्यांश का संक्षेपण कीजिए।
प्रश्न 3 — Question 3
(क) परिपत्र किसे कहते हैं? स्वास्थ्य विभाग, उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव की ओर से प्रदेश के पूर्वी जिलों के बच्चों को मस्तिष्क-ज्वर से बचाने के लिये उचित व्यवस्था हेतु एक परिपत्र तैयार कीजिए। (ख) कार्यालय आदेश का परिचय दीजिए। गृह विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जारी किसी कर्मचारी के स्थानांतरण संबंधी कार्यालय आदेश का प्रारूप तैयार कीजिए।
(क) निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों का निर्देश कीजिए: संगोष्ठी, प्रत्यक्ष, पराक्रम, निर्वसन, निस्सन्देह। (ख) मुद्रित प्रश्न के अनुसार निम्नलिखित शब्दों में प्रयुक्त उपसर्गों का निर्देश कीजिए: शैव, नीलिमा, दक्षिणात्मक, खुर्दबीन, वर्तमान।
प्रश्न 6 — Question 610 अंक — 10 marks
निम्नलिखित वाक्यों या पदबंधों के लिये एक-एक शब्द लिखिए: (i) जो कृतज्ञ न हो, (ii) जो सूर्य न देखे ऐसी स्त्री, (iii) जो रूढ़ियों में विश्वास करता हो, (iv) जो पूरा करने योग्य हो, (v) जो देश से प्रेम करता हो।
प्रश्न 7 — Question 7
(क) निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध कीजिए: राम घर जाती है; मैंने जाना है; मैंने आपके घर में रखी पुस्तक को देख ली; विद्यालय में सभी कक्षा के विद्यार्थी बुलाए गए हैं; मनोज रोती है। (ख) निम्नलिखित शब्दों की वर्तनी का संशोधन कीजिए: निष्पापी, पूर्ती, मुनी, लिपी, नीती।
प्रश्न 8 — Question 830 अंक — 30 marks
निम्नलिखित मुहावरों/लोकोक्तियों के अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए: यथा राजा तथा प्रजा; अरहर की टट्टी गुजराती ताला; आ बैल मुझे मार; नौ दो ग्यारह हो जाना; जैसा देश वैसा भेष; दाल-भात में मूसरचंद; ऊँची दुकान फीके पकवान; मान न मान मैं तेरा मेहमान; अंधेर नगरी चौपट राजा; आसमान से गिरा खजूर में अटका।
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